अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस : वसुधैव कुटुम्बकम
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ है- पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है. इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य और जीव-जन्तु एक ही परिवार का हिस्सा हैं. भारतीय समाज की प्रथम कड़ी है-परिवार. यहां की परिवार व्यवस्था pure संसार में उल्लेखनीय है, पर आज ये पारिवारिक ढांचा khatam की कगाार पर है. साहित्य समाज में व्याप्त इस अनैतिकता, अराजकता, निरंकुशता आदि अवांछनीय और असामाजिक तत्वों के दुष्प्रभाव को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप में सामने लाता है, इसीलिए कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. हम जिस परिवेश में जीते हैं, साहित्य में उसी का चित्रण होता है. वैदिक काल से ही भारतीय साहित्यकार समाज के प्रति अपने दायित्व को समझते हुए नैतिक, सामाजिक सीमाओं के भीतर जाकर उनका अन्वेषण करते रहे हैं. अपनी रचनाओं में सामाजिक जीवन का बेखौफ और बेलाग चित्रण करके समाज को जागरूक करने का कार्य करते रहे हैं. पहली भारतीय मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र‘ में समाज के लिए सत्यवाद एवं धर्मपरायणता का संदेश था.प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी‘ कहानी में परिवार में वृ़द्ध सास के प्रति बहू रूपा का अपमानजनक व्यवहार और पोती द्वारा दादी के लिए म...